खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के नवगठित जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के अंतर्गत आने वाले ग्राम शेरगढ़ में बीते दिनों उस वक्त भारी गहमागहमी मच गई, जब एक ‘रहस्यमयी पक्षी’ के दिखने से गांव में कौतूहल और आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। गांव के कर्मा भवन में बैठे एक विचित्र दिखने वाले पक्षी को ग्रामीणों ने ‘गरुड़ भगवान’ का अवतार मान लिया। हालांकि, विशेषज्ञों की जांच के बाद जो सच्चाई सामने आई, उसने आस्था और विज्ञान के बीच की उस महीन रेखा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
घटनाक्रम: जब कर्मा भवन बना ‘तीर्थ’
ग्रामीणों के अनुसार, गांव के सार्वजनिक कर्मा भवन के एक कोने में एक सफेद चेहरे और बड़ी-बड़ी आंखों वाला शांत पक्षी बैठा दिखाई दिया। पक्षी की बनावट सामान्य पक्षियों से काफी अलग थी; उसका चेहरा हृदय के आकार (Heart shape) का और पूरी तरह सफेद था। उसकी स्थिर मुद्रा और दिव्य आभा को देखकर ग्रामीणों ने तत्काल उसे ‘गरुड़ भगवान’ घोषित कर दिया।
देखते ही देखते यह खबर पूरे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई। लोग धूप-दीप और अगरबत्ती लेकर कर्मा भवन पहुंचने लगे। भजन-कीर्तन शुरू हो गया और पक्षी के सामने श्रद्धा से शीश नवाए जाने लगे। सोशल मीडिया के इस दौर में वीडियो वायरल होने में देर नहीं लगी और कुछ ही घंटों में शेरगढ़ का यह ‘चमत्कार’ हजारों मोबाइल स्क्रीन्स तक पहुंच गया।

विशेषज्ञों का खुलासा: गरुड़ नहीं, ‘बार्न आउल’ का बच्चा था वह
जब यह मामला वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के संज्ञान में आया, तो उन्होंने इस ‘रहस्यमयी पक्षी’ की पहचान की। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह कोई चमत्कारिक गरुड़ नहीं, बल्कि ‘बार्न आउल’ (Barn Owl) यानी खलिहान उल्लू का एक बच्चा है।
बार्न आउल की विशेषताएं, जिन्होंने ग्रामीणों को भ्रमित किया:
- अजीबोगरीब चेहरा: इस उल्लू का चेहरा बंदर जैसा या हृदय के आकार का होता है, जो अन्य पक्षियों से बिल्कुल भिन्न है।
- सफेद रंग: इसके बच्चे पूरी तरह सफेद और मखमली रोएं वाले होते हैं, जिससे वे किसी अलौकिक जीव की तरह दिखते हैं।
- शात स्वभाव: दिन के समय ये पक्षी प्रकाश के कारण देख नहीं पाते और एक ही जगह स्थिर बैठे रहते हैं, जिसे लोग उनकी ‘साधना’ समझ लेते हैं।

अंधविश्वास बनाम वैज्ञानिक समझ
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स का कहना है कि बार्न आउल अक्सर पुराने खंडहरों, भवनों या चिमनियों में अपना घोंसला बनाते हैं। शेरगढ़ के कर्मा भवन में भी यह पक्षी संभवतः शांति की तलाश में रुका था। यह पक्षी किसानों का सच्चा मित्र है क्योंकि इसका मुख्य भोजन चूहे और छोटे कीट हैं, जिससे यह फसलों की रक्षा करता है।
”ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के कारण अक्सर दुर्लभ दिखने वाले जीवों को देवी-देवता या अनिष्ट का प्रतीक मान लिया जाता है। यह घटना दर्शाती है कि सूचना के युग में भी अंधविश्वास का प्रभाव गहरा है।” — वन्यजीव विशेषज्ञ
कानूनी चेतावनी और अपील
जानकारों ने ग्रामीणों को आगाह किया है कि बार्न उल्लू वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) के तहत एक संरक्षित प्रजाति है। इसे पकड़ना, परेशान करना या इसके साथ छेड़छाड़ करना कानूनी अपराध है। वन विभाग ने अपील की है कि यदि भविष्य में ऐसा कोई जीव दिखे, तो पूजा-पाठ करने के बजाय विभाग को सूचना दें ताकि जीव को सुरक्षित प्राकृतिक वास में छोड़ा जा सके।
निष्कर्ष
शेरगढ़ की यह घटना एक सबक है। भले ही गांव में साक्षात ‘गरुड़’ प्रकट नहीं हुए थे, लेकिन ‘कुदरत का एक सच्चा प्रहरी’ जरूर मौजूद था। आस्था अपनी जगह है, लेकिन वन्यजीवों की सही पहचान और उनका संरक्षण ही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची सेवा है।

