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फाइलों में ‘दुरुस्त’ पर हकीकत में ‘हादसों का रास्ता’: डोंगरगढ़ में 2.5 किमी सड़क के लिए 25 साल से तरस रहे ग्रामीण

डोंगरगढ़: एक तरफ जहां देश डिजिटल इंडिया और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात कर रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से विकास के दावों की पोल खोलती एक तस्वीर सामने आई है। डोंगरगढ़ विधानसभा के घुमका ब्लॉक में ग्राम बोटेपार से खजरी तक की सड़क पिछले ढाई दशकों से अपने उद्धार की राह देख रही है। 2.5 किलोमीटर का यह सफर ग्रामीणों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है।

​25 साल पहले डली थी गिट्टी, अब सिर्फ गड्ढे शेष

​ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 20-25 साल पहले जब बोटेपार और खजरी एक ही पंचायत का हिस्सा थे, तब इस सड़क पर गिट्टी और मुरूम डाला गया था। उसके बाद से आज तक यहां डामरीकरण नहीं हुआ। वर्तमान में सड़क की हालत इतनी जर्जर है कि पैदल चलना भी दूभर है।

“इसी सड़क पर फिसलने से मेरा पैर टूट गया था। दो महीने बिस्तर पर रही, पूरा परिवार परेशान हो गया। कई बार शिकायत की, पर कोई सुनने वाला नहीं है।” > — सुशीला बाई, ग्रामीण

​किसानों पर दोहरी मार: दूरी और खर्च दोनों बढ़े

​इस जर्जर सड़क का सबसे ज्यादा खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। बोटेपार के किसानों को अपनी फसल बेचने पटेवा सोसाइटी (6 किमी दूर) जाना पड़ता है। सड़क खराब होने के कारण ट्रैक्टर ले जाना जोखिम भरा है, जिसके चलते किसानों को घुमका होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इससे ईंधन, समय और मेहनत तीनों की बर्बादी हो रही है।

​विधानसभा में उठा मुद्दा, पर जवाब से ग्रामीण असंतुष्ट

​डोंगरगढ़ विधायक हर्षिता बघेल ने इस सड़क का मुद्दा विधानसभा में उठाया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2022-23 में सड़क निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी थी और टेंडर भी हो गया था, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद काम रुक गया।

  • सरकारी दावा: विधानसभा में प्रभारी मंत्री की ओर से जवाब दिया गया कि सड़क ‘चलने योग्य’ है।
  • जमीनी हकीकत: ग्रामीण इस दावे को पूरी तरह गलत बता रहे हैं। उनका सवाल है कि अगर सड़क चलने लायक है, तो उन्हें मीलों का चक्कर क्यों काटना पड़ रहा है और आए दिन हादसे क्यों हो रहे हैं?

​बड़ा सवाल: कब खत्म होगा इंतजार?

​ग्रामीणों का कहना है कि सरपंच से लेकर मंत्रियों तक गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन की घुट्टी पिलाई गई है। फाइलों में सड़क को दुरुस्त बताना ग्रामीणों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। अब देखना यह होगा कि ‘महतारी गौरव वर्ष’ मनाने वाली सरकार इन ग्रामीण अंचलों की सुशीला बाई जैसी महिलाओं और किसानों की इस बुनियादी समस्या का समाधान कब करती है।

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