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शासकीय प्राथमिक शाला खपरी धोबी में अनूठी पहल: विद्यालय की दीवार पर जीवंत हुई छत्तीसगढ़ की लोककला, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का विशाल भित्तिचित्र बना आकर्षण का केंद्र

खपरी धोबी:-शासकीय प्राथमिक शाला खपरी धोबी के नवाचारी प्रधान पाठक धनेश राम रजक ने बच्चों को अपनी माटी, संस्कृति और लोककला से जोड़ने की दिशा में एक अनूठी और सराहनीय पहल की है। उनके विशेष प्रयासों से विद्यालय की संगीत कक्षा की दीवार पर एक कुशल पेंटर द्वारा छत्तीसगढ़ की महान पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण स्वर्गीय डॉ. तीजन बाई जी का एक विशाल और भव्य भित्तिचित्र तैयार कराया गया है।

​शिक्षा जगत में इसे एक अनूठा प्रयास माना जा रहा है, जहां कला और संस्कृति को जीवंत रखने के उद्देश्य से किसी विद्यालय में इतनी विशाल आकृति में डॉ. तीजन बाई जी का चित्र उकेरा गया है। यह भित्तिचित्र अब विद्यालय की नई पहचान बनने के साथ-साथ छात्र-छात्राओं के लिए मुख्य आकर्षण और प्रेरणा का केंद्र बन गया है।

कला और संस्कृति के प्रति समर्पण

​बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रधान पाठक धनेश राम रजक एक शिक्षक होने के साथ-साथ कुशल लेखक और कलाकार भी हैं। वे शिक्षा के साथ-साथ कला, साहित्य और संस्कृति को बच्चों के दैनिक जीवन व सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने के लिए निरंतर नवाचार करते रहते हैं। उनका दृढ़ मानना है कि बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर अपनी संस्कृति और महान विभूतियों के संघर्षमयी जीवन से भी परिचित कराना बेहद आवश्यक है।

बच्चों में जगी जानने की ललक

​प्रधान पाठक धनेश राम रजक ने साझा किया कि जब से विद्यालय की दीवार पर डॉ. तीजन बाई जी का यह विशाल चित्र बना है, तब से बच्चों में उनके बारे में जानने की विशेष जिज्ञासा देखी जा रही है। बच्चे इस सुंदर चित्र को बड़े ध्यान से निहारते हैं और उनके मन में यह सवाल उठता है कि आखिर डॉ. तीजन बाई जी कौन थीं और उन्होंने ऐसा क्या विशेष कार्य किया है, जिससे उनका यह चित्र विद्यालय में इतने बड़े पैमाने पर बनाया गया है।

​बच्चों की इसी सकारात्मक जिज्ञासा का लाभ उठाते हुए प्रधान पाठक ने उन्हें सभा या कक्षा के दौरान डॉ. तीजन बाई जी के जीवन, उनके संघर्षों और उनकी महान उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। बच्चों को बताया गया कि कैसे डॉ. तीजन बाई जी ने अपनी असाधारण प्रतिभा, कड़ी मेहनत और कला-साधना के बल पर छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पंडवानी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई तथा प्रदेश की लोक संस्कृति को पूरे विश्व पटल तक पहुंचाया।

सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव का भाव

​प्रधान पाठक ने कहा कि यह भित्तिचित्र महज एक कलाकृति या दीवार की सजावट नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने वाला एक जीवंत शैक्षिक माध्यम है। इस अनूठी पहल से न केवल बच्चों में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है, बल्कि उनके भीतर सम्मान और गौरव की भावना भी प्रबल रूप से विकसित हो रही है।

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