कबीरधाम। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में इन दिनों ‘हरा सोना’ यानी तेंदूपत्ता की चमक बिखरी हुई है। भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बावजूद वनाश्रितों के चेहरे पर मुस्कान है, क्योंकि तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य उनके लिए आर्थिक समृद्धि का मुख्य द्वार खोल रहा है। जिले के बोड़ला और पंडरिया ब्लॉक के जंगलों में सुबह होते ही आदिवासियों की टोली तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए निकल पड़ती है।
भीषण गर्मी पर भारी पड़ता उत्साह
मई की तपती धूप और बढ़ते पारे के बीच वनांचल में जनजीवन पूरी तरह तेंदूपत्ता संग्रहण पर केंद्रित हो गया है। कबीरधाम जिले के तराई और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले बैगा और गोंड जनजाति के परिवारों के लिए यह समय साल का सबसे महत्वपूर्ण सीजन होता है। तड़के 4 बजे से ही ग्रामीण अपने भोजन का पोटला बांधकर जंगलों की ओर कूच कर देते हैं, ताकि कड़ी धूप होने से पहले अधिक से अधिक पत्तों का संग्रहण किया जा सके।

आदिवासियों की तकदीर बदल रहा ‘हरा सोना’
तेंदूपत्ता को ‘हरा सोना’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह वनांचल के लोगों की आय का सबसे बड़ा जरिया है। राज्य सरकार द्वारा संग्रहण दर में की गई वृद्धि और समय पर भुगतान की व्यवस्था ने ग्रामीणों के उत्साह को दोगुना कर दिया है।
- आर्थिक मजबूती: संग्रहण केंद्रों (फड़ों) पर पत्तों की गड्डियां जमा करने के बदले मिलने वाली राशि से ग्रामीण अपने साल भर के राशन, बच्चों की शिक्षा और अन्य जरूरी खर्चों का इंतजाम करते हैं।
- स्थानीय रोजगार: पलायन रोकने में भी यह सीजन मददगार साबित होता है। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवा तक इस कार्य में हाथ बंटा रहे हैं।
संग्रहण केंद्रों (फड़ों) पर बढ़ी रौनक
जिले के विभिन्न समितियों के अंतर्गत आने वाले फड़ों पर दोपहर होते ही भारी भीड़ देखी जा सकती है। वहां पत्तों की छंटाई, गिनती और गड्डियां बनाने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। विभाग द्वारा संग्राहकों के लिए पेयजल और छाया की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है, ताकि गर्मी के कारण उन्हें परेशानी न हो।

गुणवत्ता और मानक का विशेष ध्यान
कबीरधाम का तेंदूपत्ता अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। इस वर्ष अनुकूल मौसम की वजह से पत्तों की गुणवत्ता काफी अच्छी बताई जा रही है। वन विभाग के अधिकारी लगातार क्षेत्रों का दौरा कर संग्रहण कार्य की निगरानी कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि मानक आकार के पत्तों का ही संग्रहण हो ताकि संग्राहकों को उनकी मेहनत का पूरा लाभ मिल सके।
निष्कर्ष
वनांचल में गूंजती ग्रामीणों की आवाजें और कंधों पर रखे तेंदूपत्ते की गठरियां इस बात का प्रतीक हैं कि जंगल न केवल उनकी आस्था का केंद्र हैं, बल्कि उनकी जीविका का आधार भी हैं। कबीरधाम की पहाड़ियों के बीच चमकता यह ‘हरा सोना’ निश्चित रूप से इस बार आदिवासियों की तकदीर संवारने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
रिपोर्ट: जीके न्यूज छत्तीसगढ़

