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बेरला में ‘ज़हर’ उगल रही पेपर मिलें: प्रशासन मौन, क्या ग्रामीणों की जान की कोई कीमत नहीं?

बेरला (छत्तीसगढ़): ब्लॉक बेरला के नेवनारा और अकोली क्षेत्र में स्थापित नवदुर्गा पल्प एंड पेपर मिल्स और लोहिया पेपर एंड बोर्ड प्राइवेट लिमिटेड वर्तमान में ग्रामीणों के लिए मुसीबत का सबब बन गई हैं। इन मिलों से निकलने वाले अपशिष्ट और ज़हरीली प्रदूषित गैसों ने पूरे अंचल के वातावरण को प्रदूषित कर दिया है, जिससे स्थानीय निवासियों का स्वास्थ्य गंभीर खतरे में है।

नरकीय जीवन जीने को मजबूर ग्रामीण

​नेवनारा से अकोली के बीच स्थित इन पेपर मिलों से दिन-रात निकलने वाला काला धुआं और तीखी दुर्गंध हवा में घुलकर लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस प्रदूषण के कारण उन्हें सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और बच्चों में श्वसन संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। वर्तमान में शीत ऋतु के चलते प्रदूषित गैसें और धुएं के कण वायुमंडल की निचली सतह पर जमा रहते हैं, जिससे समस्या और भी विकराल हो गई है।

खेती और पशुपालन पर भी असर

​प्रदूषण का प्रभाव केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों ने बताया कि:

  • ​मिलों के धुएं और अपशिष्ट के कारण खेतों की फसलें मुरझा रही हैं
  • ​जानवरों के लिए हरा चारा प्रदूषित हो चुका है, जिससे मवेशियों के स्वास्थ्य पर भी संकट मंडरा रहा है।

अधिकारियों की ‘मौन’ सहमति और खानापूर्ति

​ग्रामीणों में सबसे ज्यादा आक्रोश पर्यावरण संरक्षण मंडल (दुर्ग) के प्रति है। आरोप है कि विभागीय अधिकारी इस गंभीर मामले पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जांच के नाम पर केवल ‘खानापूर्ति’ की जाती है। हालांकि, सितंबर 2021 में तत्कालीन अधिकारी डॉ. अनीता सावंत ने निरीक्षण कर अनियमितताएं पाई थीं, लेकिन आज तक ठोस कार्रवाई का अभाव रहा है।

​”कंपनी और अधिकारियों की सांठगांठ के चलते आज तक न तो अंचल में कोई मेडिकल कैंप लगाया गया और न ही प्रदूषण नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम किए गए। अधिकारी जांच के नाम पर केवल पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।” — स्थानीय निवासी

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें:

  1. ​प्रदूषित गैसों के उत्सर्जन पर तत्काल रोक लगाई जाए।
  2. ​क्षेत्र में तत्काल मेडिकल जांच शिविर लगाकर ग्रामीणों के स्वास्थ्य का परीक्षण हो।
  3. ​नियम विरुद्ध संचालित हो रही मिलों पर कठोर कानूनी कार्यवाही की जाए।

​लगातार बढ़ते आक्रोश को देखते हुए अब ग्रामीण लामबंद होने लगे हैं। यदि समय रहते प्रशासन और पर्यावरण विभाग ने सुध नहीं ली, तो क्षेत्र में बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो सकता है।

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