
देवकर:- नगर देवकर से महज 3 किलोमीटर दूर एवं साजा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बुधवारा के आश्रित ग्राम बासीन में शासन-प्रशासन की उदासीनता और मंडी बोर्ड की लचर कार्यशैली का एक जीता-जागता नमूना इन दिनों ग्रामीण इलाकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जिसमे बासीन गाँव मे मुख्य सड़क किनारे छत्तीसगढ़ राज्य मंडी विपणन बोर्ड द्वारा लगभग 20 लाख रुपये की लागत से स्वीकृत किसान भवन का निर्माण पिछले 4 सालों से छज्जा लेवल पर आकर पूरी तरह अधर में अटका हुआ है। आलम यह है कि देखरेख के अभाव में यह अधूरा ढांचा अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है, जिससे गांव के किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है। स्थानीय ग्रामीणों एवं किसानों का कहना है, कि गांव स्तर धान खरीदी, बैठकों, कृषि से जुड़ी गतिविधियों एवं सामाजिक कार्यो के नाम पर गांव में आधुनिक सुविधा देने का सब्जबाग दिखाया गया था, लेकिन ठेकेदार की गैरजिम्मेदारी और विभागीय अधिकारियों की सुस्ती के चलते यह सपना कागजों तक ही सिमट कर रह गया है। फिलहाल की स्थिति में देखा जाए तो ठेकेदार द्वारा सिर्फ दीवारों का ढांचा खड़ा कर काम बीच में ही छोड़ दिए जाने के कारण, आज चार बरस बीत जाने के बाद भी छत ढालने और फिनिशिंग का मुख्य कार्य शुरू नहीं हो सका है। जबकि वही आसपास के अन्य गांवों में शानदार किसान भवन बनकर तैयार हो चुके हैं, जिन्हें देखकर बासीन गांव के ग्रामीण खुद को ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

चूँकि इस गंभीर मामले को लेकर जब जिम्मेदार महकमे की संवेदनशीलता टटोलने का प्रयास किया गया, तो मंडी बोर्ड दुर्ग संभाग के अंतर्गत बेमेतरा क्षेत्र के कार्यपालन अभियंता जयपॉल कंवर ने फोन कॉल रिसीव करना भी मुनासिब नहीं समझा, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है, कि शासन-प्रशासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद निर्माण कार्यों में इस तरह की लापरवाही खुलेआम भ्रष्टाचार और मनमानी की ओर इशारा करती है, जिससे ग्रामीण स्तर पर आमजनमानस और अन्नदाताओं में शासन के प्रति गहरी निराशा और नकारात्मकता फैल रही है। वही फिलहाल अब बासीन और बुधवारा के आक्रोशित ग्रामजनों ने जिला प्रशासन और राज्य शासन से मांग की है कि गाँव मे इस अधुरे व खण्डहर पड़े किसान भवन के निर्माण कार्य को तत्काल पूरा कराया जाए। साथ ही लापरवाह ठेकेदार पर धीमे कार्य स्वरूप के लिए कड़ी कार्रवाई किया जाए। इसके अलावा किसानों का सीधा सवाल है कि जब सरकारी योजनाओं के नाम पर लाखों-करोड़ों का बजट स्वीकृत होता है, तो आखिर अन्नदाटीआ किसानों के हक का यह भवन फाइलों और अधूरे ईंट-गारे व फण्ड के अभाव सहित समयसीमा के बीच फंसकर अधूरा रह जाता है जिसका जीता जागता प्रमाण इन दिनों बासीन के किसान भवन के अधूरे निर्माण कार्यशैली को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

