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खारुन में घुला फैक्ट्रियों का ‘कैमिकल वाला ज़हर’: बेमेतरा-रायपुर सीमा पर एनीकट का पानी हुआ काला, ग्रामीणों में स्किन इन्फेक्शन का खतरा

  • बेरला/बेमेतरा: बेमेतरा और रायपुर जिले को विभाजित करने वाली और लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली जीवनदायिनी खारुन नदी इन दिनों औद्योगिक लालच और प्रशासनिक लापरवाही की बलि चढ़ रही है। रायपुर सीमा पर स्थापित कल-कारखाने नियमों को ताक पर रखकर अपना केमिकल युक्त जहरीला और काला अपशिष्ट (Industrial Waste) सीधे नदी में बहा रहे हैं। इसका सबसे भयावह असर बेमेतरा जिले के बेरला ब्लॉक के सरहदी इलाकों में देखने को मिल रहा है, जहाँ एनीकट में जमा पानी पूरी तरह से प्रदूषित और स्याह काला हो चुका है।

भीषण गर्मी में ठहरा पानी बना ‘टाइम बम’

​मई की इस भीषण गर्मी में नदी का जलस्तर कम होने के कारण पानी में बहाव नहीं है और वह एनीकटों में ठहरा हुआ है। पानी का ठहराव होने की वजह से फैक्ट्रियों से निकलने वाले घातक रसायनों का कंसंट्रेशन (घनत्व) और भी ज़्यादा बढ़ गया है, जिससे यह प्रदूषण अब एक “साइलेंट किलर” का रूप ले चुका है। पानी से उठती तीखी दुर्गंध के कारण नदी किनारे खड़े रहना भी दूषित हवा को सांस में लेने जैसा है।

ग्रामीणों में फैल रही त्वचा की बीमारियां, जलीय जीवन खत्म

​बेरला ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले सरहदी गाँवों के स्थानीय ग्रामीण अपनी दैनिक निस्तारी, नहाने और पशुओं को पानी पिलाने जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए इसी खारुन नदी पर निर्भर हैं।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि: “इस दूषित और केमिकल युक्त जल के संपर्क में आने के कारण क्षेत्र में लोगों को गंभीर स्किन इन्फेक्शन (त्वचा रोग), खुजली और रैशेज की समस्या तेज़ी से पैर पसार रही है। इसके साथ ही दूषित पानी पीने से मवेशी भी बीमार हो रहे हैं।”

​इस रासायनिक ज़हर का सबसे पहला शिकार नदी का प्राकृतिक ईको-सिस्टम हुआ है। प्रदूषित पानी के कारण नदी का जलीय जीवन पूरी तरह नष्ट हो चुका है, मछलियाँ और अन्य जीव दम तोड़ रहे हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जल संसाधन विभाग मौन, संरक्षण के खेल की चर्चा

​इतनी बड़ी पर्यावरणीय आपदा के बाद भी जिम्मेदार माइनर जल संसाधन विभाग और पर्यावरण संरक्षण मंडल (प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) पूरी तरह से कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सब कुछ जानते हुए भी अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जिससे यह साफ झलकता है कि उद्योगों को पर्दे के पीछे से संरक्षण दिया जा रहा है। फैक्ट्रियों पर नियमानुसार ‘एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ (ETP) चलाने की बंदिश है, लेकिन वे बिना ट्रीट किए ही ज़हरीला पानी नदी में छोड़ रहे हैं।

महामारी की कगार पर इलाका: तुरंत एक्शन की दरकार

​यदि जिला प्रशासन और प्रदूषण बोर्ड ने तुरंत सख्त रुख अख्तियार नहीं किया, फैक्ट्रियों पर नकेल नहीं कसी और एनीकट के पानी की सफाई के पुख्ता इंतजाम नहीं किए, तो यह प्रदूषण आने वाले दिनों में किसी बड़ी महामारी का रूप ले सकता है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही खारुन नदी को इस ज़हर से मुक्त नहीं कराया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

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