दुर्ग। दुर्ग जिले में दोपहिया वाहन चोर गिरोह के खुलासे के साथ ही अब पुलिस विभाग के भीतर ही श्रेय (Credit) की जंग और पारदर्शिता को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सुपेला पुलिस द्वारा अपनी जिस कामयाबी की पीठ थपथपाई जा रही है, अब उसी कार्रवाई पर ‘लेन-देन’ और ‘केस ट्रांसफर’ के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

सुपेला पुलिस का दावा: संगठित गिरोह का भंडाफोड़
थाना सुपेला पुलिस ने हाल ही में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया कि उन्होंने क्षेत्र में सक्रिय एक शातिर बाइक चोर गिरोह को दबोचा है। पुलिस के मुताबिक, इस कार्रवाई में हर्ष साहू, गजानंद यादव, देवेन्द्र यादव और अजय पटेल सहित 4 आरोपियों और एक नाबालिग को पकड़ा गया है। इनकी निशानदेही पर नेहरू नगर, सुपेला और भिलाई नगर रेलवे स्टेशन क्षेत्र से चोरी की गई 5 स्प्लेंडर बाइक और 1 एक्टिवा बरामद की गई।

धमधा पुलिस की ‘मेहनत’ और सुपेला का ‘नाम’?
मामले में ट्विस्ट तब आया जब विश्वसनीय सूत्रों ने दावा किया कि यह पूरी कार्रवाई असल में सुपेला नहीं बल्कि धमधा पुलिस ने की थी। सूत्रों के अनुसार:
- संदिग्धों को सबसे पहले धमधा क्षेत्र में पकड़ा गया और प्रारंभिक पूछताछ व बरामदगी वहीं हुई।
- बरामद किए गए सभी वाहनों को पहले धमधा थाने में रखा गया, जिसके बाद एक छोटे मालवाहक से उन्हें सुपेला शिफ्ट किया गया।
- अंततः केस को सुपेला पुलिस के खाते में डाल दिया गया, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर पुलिस की इस ‘कागजी अदला-बदली’ के पीछे की मंशा क्या है?
भ्रष्टाचार के आरोप: क्या ‘डील’ के बाद एक आरोपी छूटा?
विवाद केवल श्रेय की लड़ाई तक सीमित नहीं है। चर्चा है कि इस गिरोह के एक सदस्य को कथित तौर पर भारी ‘लेन-देन’ के बाद छोड़ दिया गया। इस मामले में धमधा थाना के एक सब-इंस्पेक्टर और SDOP कार्यालय के एक चालक की भूमिका को लेकर विभाग के गलियारों में चर्चाएं तेज हैं।
अधिकारियों का पक्ष और सख्त पुलिसिंग पर सवाल
दुर्ग जिले में एसएसपी विजय अग्रवाल अपनी सख्त पुलिसिंग और अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में उनके नाक के नीचे हुई इस ‘श्रेय की जंग’ और भ्रष्टाचार के आरोपों ने विभाग की छवि पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
“मामले की जांच की जा रही है। जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी।”
— मणिशंकर चंद्रा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, दुर्ग
निष्कर्ष
एक तरफ पुलिस इसे अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता बता रही है, तो दूसरी तरफ विभाग के भीतर का यह असंतोष और पारदर्शिता की कमी जनता के भरोसे को कमजोर कर रही है। अब सभी की नजरें जांच रिपोर्ट पर हैं—क्या सच में अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा गया है, या फिर क्रेडिट और कमीशन के खेल में असली सच कहीं दब गया है?

