छुईखदान/खैरागढ़ | छुईखदान विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम बुढ़ानभाट में बुधवार की शाम एक ऐसी त्रासदी आई, जिसने कमलेश चंदेल के परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया। शाम करीब 6 बजे लगी भीषण आग ने न केवल एक मकान को राख किया, बल्कि एक परिवार के बरसों के सपनों और संचित पूंजी को पलभर में स्वाहा कर दिया।
सब कुछ जलकर हुआ खाक
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग इतनी तेजी से फैली कि ग्रामीणों के बचाव के तमाम प्रयास विफल रहे। जब तक आग पर काबू पाने की कोशिश की जाती, तब तक घर के भीतर रखा सारा सामान जल चुका था। मौके पर पहुंचे पटवारी नवजोत सिंह भाटिया ने घटना का पंचनामा तैयार किया। उन्होंने बताया कि यह ‘पूर्ण क्षति’ का मामला है। नुकसान का विवरण हृदय विदारक है:
- नकदी व जेवर: करीब 80 हजार रुपये नकद, डेढ़ तोला सोना और 20 तोला चांदी।
- घरेलू उपकरण: टीवी, पंखा, कूलर और कपड़े।
- भंडारण: साल भर का राशन और पैरा काटने की मशीन।
- निर्माण सामग्री: घर की छत के 55 टीन और 45 बल्लियां भी जलकर कोयला हो गईं।
शुरुआती जांच में आशंका जताई जा रही है कि पूजा के दौरान दीया गिरने से यह भयावह आग भड़की होगी। फिलहाल परिवार गांव के सार्वजनिक स्थल पर शरण लिए हुए है।
सिस्टम की ‘लापरवाही’ पर उठे सवाल
इस हादसे ने खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले की चरमराई आपदा प्रबंधन व्यवस्था की पोल खोल दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि दमकल की गाड़ी समय पर पहुंचती, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
”अगर दमकल विभाग की गाड़ी समय पर आती, तो शायद आज मेरा परिवार खुले आसमान के नीचे नहीं होता।”
— संतोष चंदेल, पीड़ित परिजन
जिले में संसाधनों का भारी अभाव
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पूरे जिले की 221 ग्राम पंचायतों की सुरक्षा का जिम्मा महज दो अग्निशमन वाहनों के भरोसे है, जो जिला मुख्यालय में तैनात रहते हैं। बुढ़ानभाट जिला मुख्यालय से मात्र 17 किलोमीटर दूर है, फिर भी वहां समय पर मदद नहीं पहुंच सकी। ऐसे में मुख्यालय से 60-70 किलोमीटर दूर स्थित वनांचल क्षेत्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही नजर आती है।
प्रमुख मांगें:
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने शासन-प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं:
- पीड़ित परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता और राशन उपलब्ध कराया जाए।
- बेघर परिवार के लिए अस्थायी आवास और बच्चों की शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित की जाए।
- छुईखदान विकासखंड मुख्यालय में स्थायी फायर ब्रिगेड केंद्र की स्थापना हो।
प्रशासनिक उदासीनता को लेकर ग्रामीणों में गहरा आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि यदि संसाधनों का विस्तार नहीं किया गया, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना असंभव होगा।

