डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ की आस्था के महान केंद्र और देशभर में प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी धाम में रविवार, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि महोत्सव का भव्य शुभारंभ होने जा रहा है। कभी घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के रूप में पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख तीर्थ बन चुका है। माता के जयकारों, जगमगाते ज्योति कलशों और अलौकिक रोशनी से सजे डोंगरगढ़ में एक बार फिर भक्ति का महाकुंभ सजने को तैयार है। करीब दो हजार से सवा दो हजार वर्ष पुरानी प्राचीन मान्यता वाले इस धाम का इतिहास राजा विक्रमादित्य के आशीर्वाद, माधवानल-कामकंदला की अमर प्रेमगाथा, खैरागढ़ राजपरिवार के समर्पण और मंदिर ट्रस्ट के उत्कृष्ट प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।
प्राचीन कामावती नगरी और माधवानल-कामकंदला की अमर प्रेमकथा
डोंगरगढ़ की धार्मिक पहचान के साथ एक बेहद प्राचीन और भावुक प्रेमकथा जुड़ी हुई है। लोक परंपरा के अनुसार, प्राचीन काल में यहां कामावती नगरी (कामाख्या नगरी) हुआ करती थी, जिसके राजा कामसेन थे। उन्हें उज्जयनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य का समकालीन माना जाता है।
- कला और संगीत का केंद्र: यह नगरी संगीत और नृत्य के लिए प्रसिद्ध थी। यहां की राज नर्तकी कामकंदला अपनी सुंदरता और अद्भुत नृत्यकला के लिए जानी जाती थीं।
- संगीत की एक भूल से जुड़ा मोड़: एक बार जब राजदरबार में कामकंदला का नृत्य चल रहा था, तब उज्जयनी के प्रसिद्ध संगीतज्ञ माधवानल ने द्वार पर बैठे-बैठे ही तबले और घुंघरुओं की आवाज से एक सूक्ष्म त्रुटि पकड़ ली। उसने बताया कि कामकंदला के एक घुंघरू में कंकड़ नहीं होने से ताल में अशुद्धि आ रही है।
- प्रेम और निष्कासन: जब यह बात राजा कामसेन तक पहुँची, तो माधवानल को दरबार में बुलाया गया। उसकी संगत पर कामकंदला का नृत्य देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो गए। धीरे-धीरे दोनों में प्रेम संबंध प्रगाढ़ हो गए, जो राजकुमार मदनादित्य को रास नहीं आया। राजा द्वारा माधवानल को राज्य से निकाले जाने के बाद दोनों बिछड़ गए।
राजा विक्रमादित्य का हस्तक्षेप और डोंगरगढ़ की स्थापना
अपने सच्चे प्रेम को पाने के लिए माधवानल ने उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य से सहायता की गुहार लगाई।
- न्याय के लिए युद्ध: राजा विक्रमादित्य ने दोनों को न्याय दिलाने के लिए कामावती नगरी के राजा कामसेन पर आक्रमण किया। इस भीषण युद्ध में राजा विक्रमादित्य की विजय हुई और प्रेमियों के मिलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- कथा का सबसे भावुक मोड़: कथा के अनुसार, विक्रमादित्य ने प्रेम की परीक्षा लेने के लिए कामकंदला से झूठ बोल दिया कि युद्ध में माधवानल की मृत्यु हो गई है। यह सुनते ही कामकंदला ने तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए, और उनके वियोग में माधवानल ने भी अपने प्राणों की आहुति दे दी।
- मां बम्लेश्वरी का प्राकट्य: इस त्रासदी से विचलित होकर राजा विक्रमादित्य ने डोंगरगढ़ की दुर्गम पहाड़ियों पर अपनी कुलदेवी आदिशक्ति की घोर तपस्या की। माता भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें दोनों प्रेमियों को पुनर्जीवित करने और डोंगरगढ़ में स्थायी निवास देने का वरदान दिया। इसी पावन प्रसंग से मां बम्लेश्वरी धाम की स्थापना जुड़ी हुई है।
साहित्य जगत में भी इस कथा का गहरा प्रभाव रहा है। प्राचीन नाटककार आनंदधर के संस्कृत नाटक से लेकर वर्ष 1583 में अकबर के दरबारी कवि आलम द्वारा इसे पद्यबद्ध करने और प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर द्वारा इसे छत्तीसगढ़ की लोककथा के रूप में प्रतिष्ठित करने का उल्लेख मिलता है।
खैरागढ़ राजपरिवार और मंदिर ट्रस्ट का ऐतिहासिक योगदान
आज डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर स्थित मंदिर जिस भव्य स्वरूप में नजर आता है, उसके निर्माण और सुव्यवस्थित संचालन में खैरागढ़ रियासत और स्थानीय दानवीरों का ऐतिहासिक योगदान रहा है।
- सीढ़ियों का निर्माण: आज से करीब दो सौ वर्ष पूर्व खैरागढ़ रियासत के अनन्य देवीभक्त राजा कमलनारायण सिंह ने पहाड़ी मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों और नीचे के मंदिर का निर्माण करवाया था। उन्होंने माता के कई प्रसिद्ध जसगीत भी रचे।
- ट्रस्ट की नींव (1964–1976): स्वतंत्रता के बाद रियासत के विलीन होने पर व्यवस्था प्रभावित हुई। वर्ष 1960 के आसपास जब बैगा परिवार ने देखरेख में असमर्थता जताई, तब राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह ने डोंगरगढ़ के गणमान्य नागरिकों—विशेषकर माणिकलाल तापड़िया और केदारनाथ अग्रवाल के साथ मिलकर एक समिति के गठन की रूपरेखा तैयार की।
- पंजीयन और विकास: वर्ष 1964 में केदारनाथ अग्रवाल की अध्यक्षता में समिति बनी और आगे चलकर वर्ष 1976 में ‘मां बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति’ का आधिकारिक पंजीयन हुआ। राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि सनातन हिंदू धर्म को मानने वाले स्थानीय लोग ही इसका संचालन करें।
आधुनिक सुविधाओं का विस्तार और रोपवे की सौगात
समय के साथ मां बम्लेश्वरी धाम ने सुविधाओं के मामले में मील के पत्थर तय किए हैं:
- पेयजल और व्यवस्थाएं: माणिकलाल तापड़िया के नेतृत्व में पहाड़ी पर पानी की विकट समस्या का समाधान किया गया। समय-समय पर नटवर भाई पटेल, बृजरतन भैया से लेकर वर्तमान अध्यक्ष मनोज अग्रवाल (वर्ष 2022 से) तक के कुशल नेतृत्व में मंदिर का चहुंमुखी विकास हुआ।
- रोपवे की शुरुआत (1994): धाम के इतिहास में वर्ष 1994 एक स्वर्णिम वर्ष रहा, जब वृद्धों, बच्चों और दिव्यांग श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोपवे की सुविधा शुरू की गई, जिससे पहाड़ी की चढ़ाई सुगम हो गई।
शारदीय नवरात्रि: भक्ति और उल्लास का महाउत्सव
आज यह ऐतिहासिक धाम सीमित संसाधनों के दौर से निकलकर देश के मानचित्र पर एक प्रमुख तीर्थ के रूप में स्थापित हो चुका है। शारदीय और चैत्र दोनों नवरात्रियों पर यहां विशाल मेलों का आयोजन होता है, जहां छत्तीसगढ़ सहित देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन और ज्योति कलश प्रज्वलन के लिए पहुंचते हैं।
इतिहास, लोकगाथा, और लोकआस्था का यह अनूठा संगम एक बार फिर मां बम्लेश्वरी के जयकारों के साथ गूंज उठा है, और डोंगरगढ़ का कोना-कोना दिव्यता से जगमगा उठा है।

