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सिंगारडीह उप स्वास्थ्य केंद्र में जान जोखिम में डालकर इलाज कराने को मजबूर ग्रामीण, जर्जर भवन दे रहा बड़े हादसे को आमंत्रण

​बेमेतरा:- जिले के बेरला विकासखंड अंतर्गत ग्राम सिंगारडीह में स्थित शासकीय उप स्वास्थ्य केंद्र जिम्मेदार अफसरों की अनदेखी एवं निष्क्रियता के कारण काफी समय से खुद बीमार नज़र आ रहा है और क्षेत्र में बदहाली के आंसू बहा रहा है। इन दिनों सिंगारडीह के इस उप स्वास्थ्य केंद्र की दो मंजिला इमारत पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। मरम्मत और उचित रखरखाव के अभाव में भवन की दीवारों में जगह-जगह खतरनाक और गहरी दरारें आ चुकी हैं एवं प्लास्टर उखड़ रही है, जो कभी भी किसी बड़ी अनहोनी का सबब बन सकती हैं। बरसात या सामान्य दिनों में भी इस खोखली हो चुकी इमारत के नीचे बैठकर इलाज कराना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं है। ग्रामीण और ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्यकर्मी हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर इस केंद्र में कदम रखते हैं। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि उन्होंने भवन की इस दयनीय स्थिति से उच्च अधिकारियों को लिखित में अवगत करा दिया है और जल्द ही मरम्मत कार्य शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन देखा जाए तो जमीनी हकीकत अब तक नहीं बदली है।

​सीमित संसाधन और आधे स्टाफ के भरोसे 05 गांवों की सेहत
​उल्लेखनीय है कि चिकित्सा व स्वास्थ्य विभाग के अनुसार किसी भी शासकीय उप स्वास्थ्य केंद्र सामान्यतः दो बिस्तरों का होना चाहिए, जहाँ ग्रामीणों को ओपीडी, पैथोलॉजी लैब, टीकाकरण केंद्र, सुरक्षित डिलीवरी रूम और स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।फिलहाल सिंगारडीह के इस केंद्र पर सिंगारडीह सहित खँगारपाठ, बोहारडीह, गाड़ामोर और खमतराई गांवों के सैकड़ों ग्रामीण पूरी तरह आश्रित हैं, लेकिन सुविधा व संसाधन सीमित हैं, लिहाजा उचित उपचार के लिए मरीजो को 05 किलोमीटर दूर गुधेली प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाता है। इसके अलावा यह एसएचसी स्टाफ के संकट से भी जूझ रहा है। यहाँ स्वीकृत कुल चार पदों में से केवल दो पदों पर ही सीएचओ (कम्युनिटी हेल्थ लल्लऑफिसर) और आरएचओ (रूरल हेल्थ ऑफिसर) की पदस्थापना है, जबकि शेष दो महत्वपूर्ण पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। ऐसे में सीमित स्टाफ और सीमित संसाधनों के इतनी बड़ी आबादी को बेहतर स्वास्थ्य लाभ देना पूरी तरह नामुमकिन साबित हो रहा है।

​कागजी लक्ष्यों और दावों के बीच खतरे में ग्रामीणों की जान
विदित हो ​एक तरफ प्रशासन द्वारा मैदानी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर हेल्थ अफसरों और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रति माह कम से कम 03 सुरक्षित प्रसव (प्रथम व हाई रिस्क मामलों को छोड़कर) कराने का कड़ा विभागीय लक्ष्य थमा दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि जिस उप स्वास्थ्य केंद्र की छत और दीवारें कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं, वहाँ गर्भवती महिलाओं और नवजातों को किस भरोसे रखा जाए? बुनियादी ढांचे की इस बदहाली के कारण स्थानीय ग्रामीणों में शासन-प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश पनप रहा है। ग्रामीणों की मांग है कि किसी बड़े हादसे का इंतजार करने के बजाय, शासन को तुरंत संज्ञान लेते हुए नए भवन का निर्माण या त्वरित ही इसकी मरम्मत करानी चाहिए ताकि क्षेत्र के लोगों को भयमुक्त माहौल में स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।

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